प्राणायाम रहस्य

धर्म का अनुष्ठान, अर्थोपार्जन, दिव्यकमना(शिव-संकल्प ) से संतति -उत्पत्ति तथा मोक्ष की सिद्धि – इन चतुर्विध पुरुषार्थो को सिद्ध करने के
लिए सर्वतोभावेन स्वस्थ होना परम आवश्यक है| जहा शरीर रोग ग्रस्त है , वह सूख , शांति, एवं आनंद कहा? भले ही धन, वैभव, ऐश्वर्य
,ईष्ट ,-कुटुंब तथा नाम, यश ,आदि सब कुछ प्राप्त हो , फिर भी यदि शरीर मई रक्त संचार ठीक से नहीं होता ,अंग-प्रत्यंग सुदृढ़ नहीं एवं
नसो मै बल नहीं, वह मानव शरीर मुर्दा ही कहा जायगा| मानव जीवन मै स्वस्थ मन प्राप्त करने के लिए आयुर्वेद का प्रादुर्भाव हुआ था ,
जो आज भी अतीव उपयोगी है | शरीर के आंतरिक मालो एवं दोषो को दूर करने तथा अन्तःकरण की शुद्धि करके समाधी द्वारा पूर्णानंद
की प्राप्ति हेतु ऋषि ,मुनि तथा सिद्ध योगियों ने योगिक प्रक्रिया का अविष्कार किया है | योग प्रक्रियाओं के अंतर्गत प्राणायाम का एक
अतिविशिष्ट महत्त्व है | पतंजलि ऋषि ने मनुष्य -मात्र के कल्याण हेतु अष्टांग योग का विधान किया है| उनमे यम , नियम और आसन
बहिरंग योग के अंतर्गत है जो शरीर और मन को सुद्ध करने मै सहायक है |
प्राण का अर्थ एवं महत्व
पंच तत्वों मई से एक प्रमुख तत्व वायु हमारे शरीर को जीवित रखता है और वात के रूप में शरीर के तीन दोषो मई से एक दोष है , जो
श्वास के रूप मई हमारा प्राण है | प्राण का मुख्य द्वार नासिका है | यह नासिका छिद्रो के द्वारा आता-जाता है| श्वास-प्रश्वास , जीवन
तथा प्राणायाम का आधार है | यह शरीर के आतंरिक जगत मई प्रविष्ट होकर साधक को वह की दिव्यता का अनुभव करा दे , इस उद्देश्य
को लेकर ही प्राणायाम विधि का अविष्कार ऋषि मुनीयो ने किया था |
मानव शरीर में प्राण के प्रकार
प्राण साक्षात् ब्रम्हा से अथवा प्रकृति रूप माया से उत्पन्न है | शरीरगत स्थानभेद से एक ही वायु प्राण अपान आदि नमो से व्यवहृत होता है|

प्राण शक्ति एक है ऐसी प्राण को स्थान एवं कार्यो के भेद से विविध नामो से जाना जाता है | मानव शरीर अथवा देह में पांच प्राण
तथा पांच उपप्राण है |

पंचप्राण की अवस्थिति तथा कार्य

1. प्राण(Respiratory system): शरीर में कंठ से ह्रदय पर्यन्त जो वायु कार्य करता है उसे ‘प्राण ‘ कहा जाता है | यह प्राण नासिका मार्ग ,
कंठ , स्वर -तंत्र , वाक्- इन्द्रिय , अन्न नलिका ,श्वसन तंत्र फेफड़ो एवं ह्रदय को क्रियाशीलता तथा शक्ति प्रदान करता है |
2. अपान(Excretory system ): नाभि से निचे मूलाधार पर्यन्त रहने वाले प्राणवायु को ‘अपान ‘ कहते है | मल ,मूत्र, आर्तव ,शुक्र
,अधोवायु , गर्भ का निःसारण इसी वायु के द्वारा होता है|
3. उदान : कंठ के ऊपर से सिर पर्यन्त जो प्राण कार्यशील है उसे ‘उदान ‘ कहते है | कंठ के ऊपर शरीर के समस्त अंगो नेत्र , नासिका एवं
सम्पूर्ण मुखमण्डल को ऊर्जा और आभा प्रदान है , पिच्युरि तथा पीनियल ग्रंथि सहित यह पुरे मस्तिष्क को यह ‘उदान ‘ प्राण कार्यशीलता
प्रदान करता है|
4. समान( Digestive system): ह्रदय के निचे से नाभि पर्यन्त शरीर में क्रियाशील प्राणवायु को ‘समान ‘कहते है | यकृत ,आंत।, प्लीहा
एवं अग्नाशय सहित सम्पूर्ण पाचन तंत्र की आतंरिक कार्य प्रणाली लो नियनत्रित करता है |
5. व्यान ( Circulatory system):यह जीवनी प्राण शक्ति पुरे शरीर में व्याप्त है | यह वायु शरीर की सभी गतिविधियो को नियमित तथा
नियत्रित करता है | सभी अंगो , मांस पेशियों , तंतुओ ,संधियों नाड़ियों को क्रियाशीलता ,ऊर्जा एवं शक्ति यही ‘व्यान-प्राण ‘ प्रदान
करता है |
इन पांचो प्राणो के अतिरिक्त शरीर में ‘देवदत्त ‘, ‘नाग ‘ ,’कृकल ‘ ,’कूर्म ‘ ,एवं ‘धनंजय ‘ नमक पांच उपप्राण है ,जो क्रमशः छींकना , पलक
झपकना, जँभाई लेना , खुजलाना , हिचकी लेना आदि क्रियाओ को संचालित करते है | प्राणो का कार्य प्राणमय कोश से सम्बंधित है और
प्राणायाम इन्ही प्राणो एवं प्राणमय कोश को शुद्ध, स्वस्थ , और निरोग रखने का प्रमुख कार्य करता है

प्राणायाम में उपयोगी बंधत्रय
योगासन एवं प्राणायाम द्वारा हमारे शरीर से जिस शक्ति का बहिर्गमन होता है, उसे हम बंधो के द्वारा रोककर अंतर्मुखी करते है | बंध
का अर्थ ही है बांधना, रोकना | ये बंध प्राणायाम में अत्यंत सहायक है | बिना बँधो के प्राणयाम अधूरे है इन बँधो का क्रमशः यहाँ वर्णन
किया जा रहा है |
जालंधर बंध : पद्मासन या सिद्धासन में सीधे बैठकर श्वास को अंदर भर ले | दोनों हाथ घुटने पर ठीके हुए हो | अब ठोड़ी लो थोड़ा निचे
झुकाते हुए कंठकूप मई लगाना ‘जालंधर बंध ‘ कहलाता है | दृष्टि को भ्रूमध्य में स्थिर करें | छाती आगे की ओर तनी होगी यह बंध
कण्ठस्थान के नाड़ी-जाल को बांधे रखता है |
लाभ : 1 कंठ मधर ,सुरीला और आकर्षक होता है
2 कंठ के संकोच द्वारा ईड़ा, पिंगला नाड़ियो के बंद होने और पर प्राण का सुषुम्णा में प्रवेश होता है |
3 गले के सभी रोगो में लाभप्रद है | थायरॉइड , टॉन्सिल , आदि रोगो में अभ्यसनीय है
4 विशुद्धि-चक्र की जाग्रति करता है |
उड्डियान बंध : प्राण जिस क्रिया से उठ कर , उथ्थित होके सुषुम्णा में प्रविष्ट हो जाये उसे ‘ उड्डियान बंध ‘ कहते है। खड़े होकर दोनों हाथो
को सहज भाव से दोनों घुटनो पर रखिए। श्वास बहार निकाल पेट को ढीला छोड़े। जालंधर बंध लगाते समय छाती को थोड़ा ऊपर की
ओर उठाये। पेट को कमर से लगा दे। यथाशक्ति करने के पश्चात पुनः श्वास लेकर पूर्वव्त दोहराये। प्रारम्भ में तीन चार करना पर्याप्त है धीरे
धीरे अभ्यास बढ़ाना चाहिए। इसी प्रकार पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर भी इस बंध को लगाए।
लाभ: 1 पेट-सम्बन्धी समस्त रोगो को दूर करता है।
2 प्राणो को जाग्रत कर मणिपुर चक्र का शोधन करता है।
मूलबन्ध : सिद्धासन या पद्मासन में बैठके बाह्य या आभ्यंतर कुम्भक करते हुए गुदाभाग एवं मूत्रेइद्रिय को ऊपर की और आकर्षित करे।
इस बंध में नाभि का निचे वाला हिस्सा खींच जायेगा। यह बंध ब्रम्हाकुम्भक के साथ लगाने में सुविधा रहती है। वैसे योगाभ्यासी साधक
इसे कई कई घंटो तक सहजावस्था में भी लगाए रहते है। दीर्घ अभ्यास किसी के सान्निध्य में करना उचित है।
लाभ: 1 इससे अपान का ऊध्र्गमन होकर प्राण के साथ एकता होती है इस प्रकार यह बंध मूलाधार चक्र को जाग्रत करता है और
कुंडलिनी-जागरण में अत्यंत सहायक है।
2 कोष्ठबध्ध्ता और बवासीर को दूर करने तथा जठराग्नि को तेज़ करने के लिए ये बंध अतिउत्तम है।
3 वीर्य को ऊधर्वगामी बनाता है,साधक को ऊध्र्वरेता बनाता है अतः ब्रह्मचर्य के लिए यह बंध महत्वपूर्ण है।

महाबंध : पद्मासन आदि किसी भी एक ध्यानोपयोगी आसान में बैठकर तीनो बँधो को एक साथ लगाना ‘महाबंध ‘कहलाता है इससे वह
सभी लाभ मिल जाते है।,जो पूर्वनिर्दिष्ट हैं। कुम्भक मई ये तीनो बंध लगते है।
लाभ:1 प्राण ऊर्ध्वगामी होता है।
2 वीर्य की शुद्धि और बल की वृद्धि होती है।
3 महाबंध से इड़ा,पिंगला और सुषुम्णा का संगम प्राप्त होता है।

प्राणायाम मानव शरीर को हमारे ऋषि मुनियो, साधको द्वारा दिया हुआ स्वर्ण रूपी ज्ञान है इससे हमारे आतंरिक एवं बाह्य शरीर की
शुद्धि होती है।

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