प्रेम की परिभाषा नहीं

शरीर के भीतर एक अद्भुत तरंग उठती है , जब हम किसी शदाबहार ,खूबसूरत ,दार्शनिक दृश्य को देखते है किसी के प्रति करुणा दया से भर जाते है तथा किसी व्यक्ति विशेष को देख कर भीतर से भावपूर्ण तरंगे उठती है उस अहसास के लिए कोई शब्द नहीं है ना ही उसका कोई अर्थ निकल सकता है | परन्तु सम्बोधित करने हेतु ‘प्रेम’ शब्द उपयोग किया जाता है | प्रेम संसार में सभी प्राणियों के लिए महत्वपूर्ण है जीवन से लेकर मृत्यु तक के इस सफर में प्रेम ही हमारा सह-यात्री है |
जितना प्रेम हम करते है या जितना प्रेमपूर्ण हम होते है उससे कई गुना प्रेम हमारे लिए प्रकट होता है ” प्रेम अनन्त है ,जो कही से शुरू नहीं होता और न कही पर अंत | प्रेम निरंतर एवं शुद्ध पवित्र है | सभी के भीतर एवं बाहर प्रेम नित्य बहता है परन्तु अनावश्यक इच्छाओ एवं वासनाओ की दौड़ में हम उस अछूत प्रेम को नहीं जान पाते एवं उससे वंछित रहते है “प्रेम तोह परम आनंद है जीवन की भावपूर्ण घटना ही प्रेम है | चराचर जगत में सभी दिशाओ में प्रेम है तथा उस प्रेम को उपलब्ध होने के लिए हमे स्वयं प्रेमपूर्ण होना आवश्यक है प्रेमपूर्ण व्यक्ति परम शांति को प्राप्त कर फिर किसी की कोई आशा नहीं करता है |

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हम कई घटनाये सुनते है , किसी पुरुष ने स्री को प्रेम में धोका किया या फिर किसी स्री ने पुरष के प्रेम को ठुकराया | परन्तु यह बात अर्थपूर्ण नहीं मालूम पड़ती क्यूंकि जहा प्रेम है वहा धोखा कैसे हो सकता है और अगर धोखा दिया तोह फिर वो शतप्रतिशत प्रेम नहीं था | प्रेम में जो साथ हुआ फिर निरंतर प्रेम में ही रहेगा , धोखा प्रेम का पर्याय नहीं है |
प्रेम सभी के प्रति एक भाव में ही होता है माँ , पिता , बंधू ,मित्र , या प्रिय इसमें सब के प्रति एक भाव होता है प्रेम तुलनात्मक नहीं है प्रेम अतुल्य है | किसी से प्रेम की तुलना नहीं की जा सकती ; प्रेम परम आनंद अर्थात जीवन का परम अनुभव है | प्रेम स्वयं के अनुभव से ही जाना जा सकता है स्वयं की अनुभूति ही हमे सत्य प्रेम का दर्शन करवा सकती है