योग को हमें कैसे जाने ?

यहाँ हम आपको भारत विश्व की सर्वोच्च संस्कृति ,आध्यात्मिक,आर्थिक एवं सामाजिक शक्ति का योग के आधार पर संछिप्त में वर्णन कर इसकी सत्यत्ता से रूबरू करने का प्रयास कर रहे है तथा ध्यान से पढ़े। यहाँ आज हमारा विषय योग के आधार पर जीवन दर्शन है।

योग एक जीवन दर्शन

योग एक जीवन दर्शन है ,योग आत्मानुशासन है ,योग एक जीवन पध्दति है ,योग व्याधिमुक्त व् समधिमुक्त जीवन की संकल्पना है। योग आत्मोपचार एवं आत्मदर्शन की श्रेष्ठ आध्यात्मिक विद्या है। योग व्यक्तित्व को वामन से विराट बनाने की या समग्र रूप से स्वयं को रूपांतरित व विकसित करने की आध्यात्मिक विद्या है। योग मात्र एक वैकल्पिक चिकित्सा पध्दति नहीं अपितु योग का प्रयोग परिणामो पर आधारित एक ऐसा प्रमाण है जो व्याधि को निर्मूल करता है। अतः यह एक सम्पूर्ण विद्या का,शरीर रोगों का ही नहीं बल्कि मानस रोगों का भी ,चिकित्सा शास्त्र है।
योग एलोपेथी की तरह कोई लाक्षणिक चिकित्सा नहीं अपितु रोगों के मूल कारण को निर्मूल कर हमे भीतर से स्वस्थता प्रदान करता है।

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योग को मात्र एक व्यायाम की तरह देखनाया वर्ग विशेष की मात्र पूजापाठ की एक पध्दति की तरह देखना संकीर्णतावूर्ण ,अविवेकी द्रष्टिकोण है। स्वार्थ ,आग्रह,अज्ञान एवं अहंकार से ऊपर उठकर योग को हमे एक सम्पूर्ण विज्ञान की तरह देखना चाहिए।
अष्टचक्र परिभाषा
योग की पौराणिक मान्यता है कि इससे अष्टचक्र जाग्रत होते है एवं प्राणायाम के निरंतर अभ्यास से जन्म-जन्मांतर के संचित अशुभ संस्कार व पाप परिक्षीण होते है।
हमने अष्टचक्रो की वैज्ञानिक पृष्ठ्भूमि की जब अन्वेषणा की एवं प्राचीन सांस्कृतिक शब्दों का जब अर्वाचीन चिकित्सा विज्ञान के साथ तुलनात्मक अध्ययन किया तोह पाया कि मूलाधार,स्वाधिष्ठान ,मणिपुर ,हृदय, अनाहत ,आज्ञा एवं सहस्रार चक्र क्रमशः
reproductive,excretory,digestive,skeletal,circulatory,respiratory,nervousएवं endocrinal system से सम्बन्ध है।
मूलाधार से सहस्रार चक्र तक अष्टचक्रो का जो कार्य है वही कार्य reproductive system से लेकर endocrinal system का है।
क्रियात्मक योगाभ्यास के आठ प्राणायाम इन्ही अष्टचक्रो अथवा आठ सिस्टम को सक्रीय एवं संतुलित बनाते है। एक-एक सिस्टम के असंतुलन से अनेक प्रकार की व्याधियाँ या विकार उत्पन्न होते है। भाषा कुछ भी हो विज्ञानं और अध्यात्म का तात्पर्य एक ही होता है।

भाषा तोह मात्र भावो की अभिव्यक्ति का माध्यम है ,लेकिन चार सौ वर्षो की गुलामी की आत्मग्लानि के दौर से हम कुछ ऐसे गुज़रे की हमे वात ,पित्त व कफ की बजाय anabolism,catabolism,metabolism,ठीक से समझ आता है। अपनी परंपरा, संस्कृति व ज्ञान को हम अज्ञानवश आत्मगौरव के रूप में न देखकर आत्मग्लानि से भर गए। चक्र पढ़कर चक्र में पड़ गए
परन्तु शब्द को पढ़कर हम अपने आप को systematic कहने लग गए जबकि प्राचीन ज्ञान व अर्वाचीन ज्ञान का तात्पर्य एक ही था-सत्य का बोध। प्रज्ञापराधो हि सर्वरोगाणाम मूलकारणाम के आयुर्वेदोक्त सिद्धांत के बजाय stress is the main cause of all disesases- यह वचन हमे अधिक वैज्ञानिक लगने लगा। अब तोह अज्ञान एवं आग्रह छोड़ो एवं सत्य से जोड़ो। उदहारण के लिए endocrinal system के असंतुलन से तनाव व तनावजनित ह्रदय रोग, उच्च रक्तचाप ,अवसाद ,मोटापा ,व मधुमेह आदि अनेक जटिल रोग उतपन्न हो जाते है।

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इसी तरह से स्केलीतल सिस्टम के असंतुलन से शताधिक प्रकार का (सौ से अधिक प्रकार का )तो ऑर्टराइटीस होता है एवं व्यक्ति मांशपेशियों की अनेक विकृतियों का शिकार हो जाता है। कहने का मतलब है की आंतरिक सिस्टम में आया किसी तरह का असंतुलन ही
रोग है जबकि भितर का संतुलन ही आरोग्यहै। लाखो करोड़ो लोगो पर योग के प्रत्यक्ष एवं परोक्ष प्रयोग से हमने यह पाया है की मुख्यतः आठ प्राणायामों के विधिपूर्वक एक सुनिश्चित
समय एवं संकल्पबद्ध अभ्यास से हमारे आठों चक्र या आंठो सिस्टम पूरी तरह से संतुलित हो जाते है। परिणामतः हम योग से एक निरामय जीवन पाते है। साथ ही हम दवा के रूप में जो केमिकल साल्ट या हार्मोन बहार से ले रहे थे ,धीरे-धीरे उसकी आवश्यकता नहीं रह जाती क्योंकि जो हम बहार से ले रहे थे वे सारे साल्ट या हार्मोन्स हमे भीतर से ही संतुलित मात्रा में प्राप्त हो जाते है।
योग एलोपैथी की तरह एक पिजन होल ट्रीटमेंट ' न होकर आरोग्य की एक सम्पूर्ण संकल्पना है , आपातकालीन चिकित्सा व शल्य चिकित्सा को छोड़कर शेष चिकित्सा के सभी क्षेत्रो में योग एक श्रेश्ठतम चिकित्सा विधा है।