संसार में गलत-सही की तुलना

सदियों से चल रहे इस संसार मे हर वस्तु, व्यक्ति, विशेष की आपस मे तुलना की जाती हैं अच्छी बुरी, सही गलत, बड़ा छोटा , गरम ठंडा कोई भी चीज हो तुलना की जाती हैं ! तुलना करना बुद्धि का कार्य हैं बुद्धि हर चीज को दो मे बाँट देती हैं | मनुष्य ही ऐसा प्राणी हैं जो तुलना करता हैं बाकि संसार मे प्रकृति अपने अस्तित्व मे ही है तथा मनुष्य ही अपनी तुलनाओं के कारण प्रकृति से खुद को भिन्न समझने लगा है | मनुष्य इस प्रकृति से अलग नहीं हैं अर्थात प्रकृति ही हैं और इस संसार का ही रूप है | परमात्मा से बना हुआ ये संसार भी परमात्मा ही है तथा परमात्मा की किसके साथ क्या तुलना की जा सकती हैं |

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सही अथवा गलत का हिसाब मनुष्यों के द्वारा स्वनिर्मित है तुलना करके ही ये अपना जीवन जीते एवं मरते है जैसे हम अगर सम्भोग सेक्स की बात करे तोह कई लोग गलत ठहराने लगेंगे कुछ लोग होंगे जो ठीक भी कहेंगे यही तुलना हैं परन्तु सेक्स प्राकृतिक है कोई भी स्त्री हो या पुरुष किसीको भी किसीके लिए सम्भोग की भावना उतपन्न हो सकती हैं यह प्राकृतिक घटना है इसमें गलत या सही कहा हैं परन्तु सिर्फ तुलना करने के कारण ही सम्भोग के प्रति अलग विचारधारा उतपन्न हो गयी है इसलिए मनुष्य को कामवासना घेर लेती हैं | मनुष्यों ने अपनी बुद्धि से अपने आप को इस संसार से अलग तोला हैं इसीलिए प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं संसार परम् अस्तित्व हैं | आपस मे तुलना करके भी बहुत परेशानिया उजागर हो गयी हैं गरीब अमीर की तुलना बहुत ही दयनीय हैं अमीर तोह अपने अहम मे जीवन जीता हैं तथा गरीब अपने आपको छोटा समझ कर खुद ही जीवन मे सफल नहीं हो पाता | किसी से अपनी तुलना करना व्यर्थ है क्यूंकि हर व्यक्ति का यहां एक अलग संसार हैं जो उसके कर्म अनुसार चलेगा तथा मृत्यु ही अंत हैं तुलना करने से अमूल्य जीवन मे व्यर्थ भटकाव आता हैं |