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क्यों लोग जरूरत होने पर याद करते है?

By Your BrainNo Comments

ऐसे तो उन लोगो को फुर्सत नहीं रहती है ,यु तो वे दिन भर मोबाइल पर ऑनलाइन रहेंगे. लेकिन कभी बात नहीं करेंगे. ये कौन लोग है ? क्या आपके दोस्त है या आपके रिश्तेदार या आपके परिवार का कोई सदस्य , जो कभी आगे रहकर आपकी मदद नहीं करेंगे लेकिन आप उसकी मदद के समय हमेशा आगे आ जाते हो , भले ही एक फ़ोन आया हो आप तुरंत उसके पास चले जाते हो ,लेकिन कोई उसको समझ ही नहीं सकता है , लेकिन ऐसे लोगो को कुछ लोग बेकूफ़ समझते है , कहते है लोग आज के ज़माने में किसी की मदद ही नहीं करना चाहिए भले अपना भाई हो या रिश्तेदार ,आपको जब जरुरत होगी तो आपको पूछेगा भी नहीं, अगर आप याद न करो तो वो भी आपको याद नहीं करेगा ,भले आप उसके प्रति कितना भी स्नेह रखो, आप उसको कितना भी खिलाओ -पिलाओ , उसको कोई फर्क नहीं पड़ता ,

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संसार में गलत-सही की तुलना

By Your BrainNo Comments

सदियों से चल रहे इस संसार मे हर वस्तु, व्यक्ति, विशेष की आपस मे तुलना की जाती हैं अच्छी बुरी, सही गलत, बड़ा छोटा , गरम ठंडा कोई भी चीज हो तुलना की जाती हैं ! तुलना करना बुद्धि का कार्य हैं बुद्धि हर चीज को दो मे बाँट देती हैं | मनुष्य ही ऐसा प्राणी हैं जो तुलना करता हैं बाकि संसार मे प्रकृति अपने अस्तित्व मे ही है तथा मनुष्य ही अपनी तुलनाओं के कारण प्रकृति से खुद को भिन्न समझने लगा है | मनुष्य इस प्रकृति से अलग नहीं हैं अर्थात प्रकृति ही हैं और इस संसार का ही रूप है | परमात्मा से बना हुआ ये संसार भी परमात्मा ही है तथा परमात्मा की किसके साथ क्या तुलना की जा सकती हैं |

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सही अथवा गलत का हिसाब मनुष्यों के द्वारा स्वनिर्मित है तुलना करके ही ये अपना जीवन जीते एवं मरते है जैसे हम अगर सम्भोग सेक्स की बात करे तोह कई लोग गलत ठहराने लगेंगे कुछ लोग होंगे जो ठीक भी कहेंगे यही तुलना हैं परन्तु सेक्स प्राकृतिक है कोई भी स्त्री हो या पुरुष किसीको भी किसीके लिए सम्भोग की भावना उतपन्न हो सकती हैं यह प्राकृतिक घटना है इसमें गलत या सही कहा हैं परन्तु सिर्फ तुलना करने के कारण ही सम्भोग के प्रति अलग विचारधारा उतपन्न हो गयी है इसलिए मनुष्य को कामवासना घेर लेती हैं | मनुष्यों ने अपनी बुद्धि से अपने आप को इस संसार से अलग तोला हैं इसीलिए प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं संसार परम् अस्तित्व हैं | आपस मे तुलना करके भी बहुत परेशानिया उजागर हो गयी हैं गरीब अमीर की तुलना बहुत ही दयनीय हैं अमीर तोह अपने अहम मे जीवन जीता हैं तथा गरीब अपने आपको छोटा समझ कर खुद ही जीवन मे सफल नहीं हो पाता | किसी से अपनी तुलना करना व्यर्थ है क्यूंकि हर व्यक्ति का यहां एक अलग संसार हैं जो उसके कर्म अनुसार चलेगा तथा मृत्यु ही अंत हैं तुलना करने से अमूल्य जीवन मे व्यर्थ भटकाव आता हैं |

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अशांत जीवन में शांति कैसे पाए

By Your BrainNo Comments

दैनिक गतिविधियों एवं कई परेशानियों ,व्विपदाओं का निरंतर समावेश हमारे जीवन का हिस्सा है , जिसके कारण हम दुःख एवं सुख की खोज करते है ऐसी कितनी ही आशाएँ एवं इच्छाएँ हमारे मन में रोज पनपती रहती है | हमारा मन रोज नई-नई आकांक्षाओ की पूर्ति करना चाहता है ऐसे में हमारा जीवन शांति को कैसे प्राप्त हो सकता है | शांति के लिए सर्वप्रथम हमे हमारे जीवन को गहरायी से समझ लेना बहुत जरुरी होता है , इंसान जीवन में मेहनत मशक़्क़त करता है नाम कमाता है , धन कमाता है, इछाओ की पूर्ति करता है परन्तु एक समय ऐसा भी आता है जब वह जीवन से ऊब जाता है या थक जाता है तथा अशांत हो जाता है | हमे मनुष्य जीवन परम शांति का अनुभव करने के लिए ही मिला है इसके लिए हमे ये जान लेना बहुत आवश्यक है की अनन्त ब्रह्माण्ड में इस पृथ्वी पर
जहा हमारा वास है ‘ हमारे इस संसार में किसी भी घटना के होने के पीछे कोई भी कारण नहीं है सब अपने आप में दिव्य एवं परम है | हमे इस बात पर भी गौर करना चाहिए की फिर हमारे जीवन में दुःख एवं अशांति होने का क्या कारण है तथा खोजने पर हम पायेँगे हमारा मन ही हमारी अशांति का कारण है|

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मन को समझ लेना बहुत आवश्यक है , मन हमारे शरीर का कोई अंग नहीं है परन्तु हमारे भीतर विचारो का निरंतर प्रवाह मन से ही होता है | मन हमारे शरीर के भीतर ऐसा चँचल है जैसे किसी गाँव में पागल कुत्ता होता है तथा चँचल मन के कारण ही हम अशांत हो जाते है तथा जीवन में अमूल्य शांति को प्राप्त नहीं कर पाते है | मन की शांति के लिए हमे दैनिक जीवन से कुछ समय निकाल कर मन की गतिविधियों को समझने के लिए निकालना चाहिए |
दिनभर में या रात को सोते हुए जब भी हम फ्री हो एकांत में बैठे हमारे गैजेट्स मोबाइल को बंद करके रख दे तथा मोन धारण करने की कोशिश करे जितना भी देर आप कर सकते है उतनी देर मोन को धारण करे किसी भी अवस्था में बैठकर या लेटकर भीड़ में हो तब भी कर सकते है | दिन में आपसे जितना हो सके उतनी बार मोन रहने की कोशिश करे एवं अपनी साँस के अंदर एवं बाहर होने पर ध्यान लगाए आपका मन धीरे धीरे विसर्जित होने लगेगा तथा आप अपने विचारो के आवागमन को समझ पाएंगे जिससे आप और गहरी शांति को अनुभव कर पाएंगे | ऐसा निरंतर करे इस प्रक्रिया को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बना ले | आप हमेशा एक नयी एवं शुद्ध शांति को अनुभव करते जायेंगे और आपके जीवन में भी एक परम शांति की लहर चलना शुरू हो जायगी |

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प्रेम की परिभाषा नहीं

By Your BrainNo Comments

शरीर के भीतर एक अद्भुत तरंग उठती है , जब हम किसी शदाबहार ,खूबसूरत ,दार्शनिक दृश्य को देखते है किसी के प्रति करुणा दया से भर जाते है तथा किसी व्यक्ति विशेष को देख कर भीतर से भावपूर्ण तरंगे उठती है उस अहसास के लिए कोई शब्द नहीं है ना ही उसका कोई अर्थ निकल सकता है | परन्तु सम्बोधित करने हेतु ‘प्रेम’ शब्द उपयोग किया जाता है | प्रेम संसार में सभी प्राणियों के लिए महत्वपूर्ण है जीवन से लेकर मृत्यु तक के इस सफर में प्रेम ही हमारा सह-यात्री है |
जितना प्रेम हम करते है या जितना प्रेमपूर्ण हम होते है उससे कई गुना प्रेम हमारे लिए प्रकट होता है ” प्रेम अनन्त है ,जो कही से शुरू नहीं होता और न कही पर अंत | प्रेम निरंतर एवं शुद्ध पवित्र है | सभी के भीतर एवं बाहर प्रेम नित्य बहता है परन्तु अनावश्यक इच्छाओ एवं वासनाओ की दौड़ में हम उस अछूत प्रेम को नहीं जान पाते एवं उससे वंछित रहते है “प्रेम तोह परम आनंद है जीवन की भावपूर्ण घटना ही प्रेम है | चराचर जगत में सभी दिशाओ में प्रेम है तथा उस प्रेम को उपलब्ध होने के लिए हमे स्वयं प्रेमपूर्ण होना आवश्यक है प्रेमपूर्ण व्यक्ति परम शांति को प्राप्त कर फिर किसी की कोई आशा नहीं करता है |

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हम कई घटनाये सुनते है , किसी पुरुष ने स्री को प्रेम में धोका किया या फिर किसी स्री ने पुरष के प्रेम को ठुकराया | परन्तु यह बात अर्थपूर्ण नहीं मालूम पड़ती क्यूंकि जहा प्रेम है वहा धोखा कैसे हो सकता है और अगर धोखा दिया तोह फिर वो शतप्रतिशत प्रेम नहीं था | प्रेम में जो साथ हुआ फिर निरंतर प्रेम में ही रहेगा , धोखा प्रेम का पर्याय नहीं है |
प्रेम सभी के प्रति एक भाव में ही होता है माँ , पिता , बंधू ,मित्र , या प्रिय इसमें सब के प्रति एक भाव होता है प्रेम तुलनात्मक नहीं है प्रेम अतुल्य है | किसी से प्रेम की तुलना नहीं की जा सकती ; प्रेम परम आनंद अर्थात जीवन का परम अनुभव है | प्रेम स्वयं के अनुभव से ही जाना जा सकता है स्वयं की अनुभूति ही हमे सत्य प्रेम का दर्शन करवा सकती है

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क्रोध का मनोविज्ञान

By Your BrainNo Comments

‘क्रोध क्या है | क्रोध हमारे चित्त की एक उलझन भरी दशा है जिसमे मनुष्य बिना होशपूर्ण हुए ही गलत आचरण कर देता है तथा क्रोध के शांत होने पर पछतावा करता है की इतना नुक्सान होगया मेरी अन्तर्दशा का , मेरे द्वारा क्यों किया गया क्रोध , अशांत मन में ही क्रोध उतपन्न होता है यह बात जान लेना बहुत आवश्यक है | शांत चित्त वाला मनुष्य कभी क्रोध का अपने भीतर जन्म नहीं होने देता | नकारात्मकता ही क्रोध की जननी है इसलिए नकारत्मक विचारो एवं लोगो से दूरी बनाये रखना चाहिए क्यूंकि व्यर्थ विवाद करना उचित नहीं होता है |

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क्रोध करना आसान नहीं होता, क्रोध करने के लिए उसकी तैयारी आवश्यक होती है क्यूंकि जितना क्रोध हम सामने वाले इंसान पर करना चाहते है उतनी ही जटिलता हमारे भीतर उतपन्न करनी होती है हमारी अंतरात्मा को उतना ही दुखाना पड़ता है जितना सामने वाला हमारे क्रोध से दुःख पाता है | जितना दुखी हम सामने खड़े इंसान को करना चाहते है उतना ही द्वेष घृणा हमारे अंदर भी जन्म लेती है इसलिए क्रोध करना उचित नहीं कहा गया है क्यूंकि इससे हमारी क्षति है और ऐसे क्रोध करने से क्या फायदा है जिससे हम खुद नुकसान में रहे |
कई बार हम देखते है कोई व्यक्ति अपने आपे से बाहर हो जाता है और जो घटना वह नहीं करना चाहता वो भी कर देता है जिससे उसे बाद में दुःख और पछतावा होने लगता है | क्रोध तुमसे किसीने करने को नहीं कहा था परन्तु क्रोध किया गया, क्रोध एक अकस्मात् घटना की तरह है हमारे चित्त की मनोदशा का प्रभाव ही क्रोध का कारण बनता है | सकारात्मक विचारो वाला इंसान कभी क्रोध नहीं करता क्यूंकि उसकी मनोदशा नकारात्मक विचार वाले इंसान से सुलभ एवं शुद्ध है |

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हमने वो कहावत सुनी है की दुसरो पर कीचड़ उछालने के लिए पहले खुद के हाथ गंदे करने पड़ते है , इसी प्रकार दूसरे पर क्रोध करने के लिए हमे खुद जटिल एवं क्रोधी होना पड़ता है क्रोध किसी भी समस्या का हल नहीं हो सकता परन्तु समस्या को बढ़ाने में अवश्य मदद करता है | शांत चित्त वाला इंसान हमेशा अच्छे आचरण का धनी होता है तथा किसी भी कार्य में बाधा आने पर संयम से काम लेता है , परन्तु क्रोध करने वाला इंसान बनते काम बिगाड़ सकता है | क्रोध करना किसी किसी की बहुत बुरी आदत साबित होती है जिससे उससे कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है | शांत विचारो को अपनाये एवं सरल तथा सफल जीवन की कामना करे |
क्यूंकि इस छोटी सी जिंदगी में बेशुमार दौलत कमाई जा सकती है परन्तु दौलत से मन की शांति कभी नहीं कमाई जा सकती , शांति के लिए हमे ही प्रयास करना पड़ता है |

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आदत क्या हे

By Spirituality, Your BrainNo Comments

बहुत ही आम एवं सरल घटना है जीवन की ‘आदत हो जाना, परन्तु क्या हम जानते है आदत हम खुद बनाते है जाने-अनजाने हम उसमे इतना खो जाते है की छोड़ने से भी नहीं छोड़ी जाती | आदते कैसी भी हो सकती है अच्छी या बुरी | सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक हम हमारी आदतों में ही उलझे रहते है | अच्छी आदतें तोह हमारे जीवन में लाभकारी सिद्ध होती है जिससे हमारा जीवन सुगमता से चलता है परन्तु बुरी आदतें हमारे जीवन को बर्बादी की ओर ले जाती है इसलिए हमे हमारी आदतों का सही चुनाव करना बहुत आवश्यक है|

जिंदगी की शुरुवात से देखे , एक बच्चा जन्म लेता है थोड़ा बड़ा होता है, देखने लगता है, सुनने लगता है तब उसे सिखाया जाता है सामने खड़ी औरत जिसने उसे पोषण दिया वो माँ है | माँ को वो नहीं जानता परन्तु सीखने के बाद उसकी आदत का हिस्सा बन जाता है और वो माँ कहने लग जाता है इसी प्रकार जीवन नयी नयी आदतों में चलता रहता है | जन्म से लेकर मृत्यु तक मनुष्य हो या अन्य प्राणी अपनी आदतों के अनुसार ही अपना जीवन जीता है|हमने देखा है कुछ लोग मांसाहारी होते है और कुछ लोग शाकाहारी इसके पीछे भी उनकी आदत ही कारण है

 

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जिसने बचपन से शाकाहारी भोजन लिया है उसे उसकी आदत हो गयी है परन्तु एक दिन अगर आप अचानक उसके सामने माँस खाने के लिए दोगे तोह वो नहीं खा पायेगा क्यूंकि वह उसकी आदत से भिन्न है | हम यह जान रहे है आदत क्या है परन्तु हमे हमारी आदतों का सही चुनाव बहुत आवश्यक है |
तम्बाकू,सिगरेट,शराब, गांजा और भी नशीले पदार्थ जिनकी लत बहुत आसानी से लगती है और धीरे-धीरे आदत में बदल जाती है जीवन गलत दिशा में बढ़ने लगता है सूझ-बुझ खो जाती है | ऐसी आदतों से निरंतर दुरी बनाये और स्वस्थ रहे अगर आप इन आदतों से ग्रस्त हो चुके है तोह प्रयास करे इन्हे कम किया जाने का क्यूंकि बुरी आदत से आपका और आपके परिवार का नुकसान है |
गलत आदतों से बचने का उपाय भी साधारण है परन्तु धैर्य एवं विवेक से हम इनसे छुटकारा पा सकते है ,जाने कैसे हम इसके लिए प्रयास कर सकते है ” जब भी लत हमे घेर ले उस वक्त हमारी सांसो की गति बदल ले इससे हमारे मन में उठने वाले विचार जो की हमे हमारी आदतों की ओर आकर्षित करते है शांत हो जाते है ,निरंतर विचारो को शुद्ध करे सकारात्मकता लाये | प्रयास करे गलत आदतों की जगह पर अच्छी आदतें लाने का गलत विचार ही हमे गलत दिशा देते है इसलिए सकारात्मक विचारो को सोचे और जीवन को एक सफल दिशा में अग्रसर करे |

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तीसरा नेत्र क्या है ?

By Yoga, Your BrainNo Comments

यहां हम आपको कुछ रोचक जानकारी प्रदान कर रहे है तीसरी आँख (the third eye) जिसका जाग्रत होना अतिआवशयक है संसार के सभी प्राणियों में सिर्फ मानव शरीर में यह क्रिया होती है | वर्तमान में आधुनिक चिकित्सा विज्ञान द्वारा पूर्व योगविज्ञान द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत नाड़ी द्वारा मस्तिष्क के दोनों भागो का प्रयोग को अत्यंत महत्त्व दिया जा रहा है |
योगविज्ञान में नाड़ी को मानवशरीर में प्रवाहित होने वाली भौतिक ,मानसिक व् आध्यात्मिक ऊर्जा का माध्यम बताया गया है| हमारे शरीर में 72 हजार से भी अधिक नाड़ियाँ स्थित है ,किन्तु इन सभी नाड़ियो में इडा ,पिंगला व सुषुम्णा नाड़ी सर्वाधिक महत्वपूर्ण है | सामान्य अवस्था में केवल इडा अथवा पिंगला नाडिया ही सक्रीय रहती है , सुषुम्णा नाड़ी सामान्यतया निष्क्रिय ही रहती है |

श्वसन क्रिया के दौरान शरीर में प्रविष्ट होने वाली प्राणवायु या तो इडा नाडी के मध्य से अथवा पिंगला नाडी के मध्य से यात्रा करती है| इडा(चन्द्रस्वर )नाडी का आरम्भ बांए नासाछिद्र से होता है ,जो दाँये नासाछिद्र से मिलता है |इस प्रकार प्रवाहित प्राणवायु लघुमस्तिष्क(cerebellum)व मेड्यूला ओब्लोंगेटा (medulla oblongata)में प्रविष्ट होती हुई ,सुषुम्णा काण्ड के बाँए तरफ यात्रा करते हुए सुषुम्णा काण्ड के अंत में यात्रा समाप्त करती है | इसी प्रकार दूसरी ओर पिंगला (सूर्यस्वर )नाडी द्वारा भी प्राणवायु के संचरण का कार्य सम्पादित होता है

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नासिका के आतंरिक कोषो में स्थित प्रत्येक नासिका छिद्र में कार्टिलेज नामक ऊत्तक )tissue )से बने द्वार होते है ,जिनका पूर्ण नियंत्रण आज्ञाचक्र के द्वारा सम्पादित होता है | श्वसन की अवस्था में जब एक छिद्र खुलता है तो उसी समय दूसरे नासिका छिद्र से श्वास का प्रवेश पूर्णतया बंद हो जाता है | नासिका के ऊपरी भाग (छत )पर,जहा दोनों नासाछिद्र संयुक्त होते है एवं जहा इडा एवं पिंगला नाडी का उद्गम स्थान होता है ,वहा शरीर का प्रमुख जीवनीय बिंदु (vital spot )होता है | यही पर इडा (parasympathetic परानुकम्पी )एवं पिंगला (sympathetic अनुकम्पी) संयुक्त होकर एक प्लेक्सस (plexus )बनाती है ,जिसे आज्ञाचक्र कहते है |
हमारे जीवन साधना के शास्त्रों में इसे तीसरे नेत्र (the third eye )की संज्ञा दी गयी है जो साधक इस बिंदु को सक्रीय कर लेता है वह अद्वितीय शक्ति को धारण कर लेता है