yoga01

प्राणायाम रहस्य

By SpiritualityNo Comments

धर्म का अनुष्ठान, अर्थोपार्जन, दिव्यकमना(शिव-संकल्प ) से संतति -उत्पत्ति तथा मोक्ष की सिद्धि – इन चतुर्विध पुरुषार्थो को सिद्ध करने के
लिए सर्वतोभावेन स्वस्थ होना परम आवश्यक है| जहा शरीर रोग ग्रस्त है , वह सूख , शांति, एवं आनंद कहा? भले ही धन, वैभव, ऐश्वर्य
,ईष्ट ,-कुटुंब तथा नाम, यश ,आदि सब कुछ प्राप्त हो , फिर भी यदि शरीर मई रक्त संचार ठीक से नहीं होता ,अंग-प्रत्यंग सुदृढ़ नहीं एवं
नसो मै बल नहीं, वह मानव शरीर मुर्दा ही कहा जायगा| मानव जीवन मै स्वस्थ मन प्राप्त करने के लिए आयुर्वेद का प्रादुर्भाव हुआ था ,
जो आज भी अतीव उपयोगी है | शरीर के आंतरिक मालो एवं दोषो को दूर करने तथा अन्तःकरण की शुद्धि करके समाधी द्वारा पूर्णानंद
की प्राप्ति हेतु ऋषि ,मुनि तथा सिद्ध योगियों ने योगिक प्रक्रिया का अविष्कार किया है | योग प्रक्रियाओं के अंतर्गत प्राणायाम का एक
अतिविशिष्ट महत्त्व है | पतंजलि ऋषि ने मनुष्य -मात्र के कल्याण हेतु अष्टांग योग का विधान किया है| उनमे यम , नियम और आसन
बहिरंग योग के अंतर्गत है जो शरीर और मन को सुद्ध करने मै सहायक है |
प्राण का अर्थ एवं महत्व
पंच तत्वों मई से एक प्रमुख तत्व वायु हमारे शरीर को जीवित रखता है और वात के रूप में शरीर के तीन दोषो मई से एक दोष है , जो
श्वास के रूप मई हमारा प्राण है | प्राण का मुख्य द्वार नासिका है | यह नासिका छिद्रो के द्वारा आता-जाता है| श्वास-प्रश्वास , जीवन
तथा प्राणायाम का आधार है | यह शरीर के आतंरिक जगत मई प्रविष्ट होकर साधक को वह की दिव्यता का अनुभव करा दे , इस उद्देश्य
को लेकर ही प्राणायाम विधि का अविष्कार ऋषि मुनीयो ने किया था |
मानव शरीर में प्राण के प्रकार
प्राण साक्षात् ब्रम्हा से अथवा प्रकृति रूप माया से उत्पन्न है | शरीरगत स्थानभेद से एक ही वायु प्राण अपान आदि नमो से व्यवहृत होता है|

प्राण शक्ति एक है ऐसी प्राण को स्थान एवं कार्यो के भेद से विविध नामो से जाना जाता है | मानव शरीर अथवा देह में पांच प्राण
तथा पांच उपप्राण है |

[vc_single_image image=”60″ img_size=”full”]

पंचप्राण की अवस्थिति तथा कार्य

1. प्राण(Respiratory system): शरीर में कंठ से ह्रदय पर्यन्त जो वायु कार्य करता है उसे ‘प्राण ‘ कहा जाता है | यह प्राण नासिका मार्ग ,
कंठ , स्वर -तंत्र , वाक्- इन्द्रिय , अन्न नलिका ,श्वसन तंत्र फेफड़ो एवं ह्रदय को क्रियाशीलता तथा शक्ति प्रदान करता है |
2. अपान(Excretory system ): नाभि से निचे मूलाधार पर्यन्त रहने वाले प्राणवायु को ‘अपान ‘ कहते है | मल ,मूत्र, आर्तव ,शुक्र
,अधोवायु , गर्भ का निःसारण इसी वायु के द्वारा होता है|
3. उदान : कंठ के ऊपर से सिर पर्यन्त जो प्राण कार्यशील है उसे ‘उदान ‘ कहते है | कंठ के ऊपर शरीर के समस्त अंगो नेत्र , नासिका एवं
सम्पूर्ण मुखमण्डल को ऊर्जा और आभा प्रदान है , पिच्युरि तथा पीनियल ग्रंथि सहित यह पुरे मस्तिष्क को यह ‘उदान ‘ प्राण कार्यशीलता
प्रदान करता है|
4. समान( Digestive system): ह्रदय के निचे से नाभि पर्यन्त शरीर में क्रियाशील प्राणवायु को ‘समान ‘कहते है | यकृत ,आंत।, प्लीहा
एवं अग्नाशय सहित सम्पूर्ण पाचन तंत्र की आतंरिक कार्य प्रणाली लो नियनत्रित करता है |
5. व्यान ( Circulatory system):यह जीवनी प्राण शक्ति पुरे शरीर में व्याप्त है | यह वायु शरीर की सभी गतिविधियो को नियमित तथा
नियत्रित करता है | सभी अंगो , मांस पेशियों , तंतुओ ,संधियों नाड़ियों को क्रियाशीलता ,ऊर्जा एवं शक्ति यही ‘व्यान-प्राण ‘ प्रदान
करता है |
इन पांचो प्राणो के अतिरिक्त शरीर में ‘देवदत्त ‘, ‘नाग ‘ ,’कृकल ‘ ,’कूर्म ‘ ,एवं ‘धनंजय ‘ नमक पांच उपप्राण है ,जो क्रमशः छींकना , पलक
झपकना, जँभाई लेना , खुजलाना , हिचकी लेना आदि क्रियाओ को संचालित करते है | प्राणो का कार्य प्राणमय कोश से सम्बंधित है और
प्राणायाम इन्ही प्राणो एवं प्राणमय कोश को शुद्ध, स्वस्थ , और निरोग रखने का प्रमुख कार्य करता है

प्राणायाम में उपयोगी बंधत्रय
योगासन एवं प्राणायाम द्वारा हमारे शरीर से जिस शक्ति का बहिर्गमन होता है, उसे हम बंधो के द्वारा रोककर अंतर्मुखी करते है | बंध
का अर्थ ही है बांधना, रोकना | ये बंध प्राणायाम में अत्यंत सहायक है | बिना बँधो के प्राणयाम अधूरे है इन बँधो का क्रमशः यहाँ वर्णन
किया जा रहा है |
जालंधर बंध : पद्मासन या सिद्धासन में सीधे बैठकर श्वास को अंदर भर ले | दोनों हाथ घुटने पर ठीके हुए हो | अब ठोड़ी लो थोड़ा निचे
झुकाते हुए कंठकूप मई लगाना ‘जालंधर बंध ‘ कहलाता है | दृष्टि को भ्रूमध्य में स्थिर करें | छाती आगे की ओर तनी होगी यह बंध
कण्ठस्थान के नाड़ी-जाल को बांधे रखता है |
लाभ : 1 कंठ मधर ,सुरीला और आकर्षक होता है
2 कंठ के संकोच द्वारा ईड़ा, पिंगला नाड़ियो के बंद होने और पर प्राण का सुषुम्णा में प्रवेश होता है |
3 गले के सभी रोगो में लाभप्रद है | थायरॉइड , टॉन्सिल , आदि रोगो में अभ्यसनीय है
4 विशुद्धि-चक्र की जाग्रति करता है |
उड्डियान बंध : प्राण जिस क्रिया से उठ कर , उथ्थित होके सुषुम्णा में प्रविष्ट हो जाये उसे ‘ उड्डियान बंध ‘ कहते है। खड़े होकर दोनों हाथो
को सहज भाव से दोनों घुटनो पर रखिए। श्वास बहार निकाल पेट को ढीला छोड़े। जालंधर बंध लगाते समय छाती को थोड़ा ऊपर की
ओर उठाये। पेट को कमर से लगा दे। यथाशक्ति करने के पश्चात पुनः श्वास लेकर पूर्वव्त दोहराये। प्रारम्भ में तीन चार करना पर्याप्त है धीरे
धीरे अभ्यास बढ़ाना चाहिए। इसी प्रकार पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर भी इस बंध को लगाए।
लाभ: 1 पेट-सम्बन्धी समस्त रोगो को दूर करता है।
2 प्राणो को जाग्रत कर मणिपुर चक्र का शोधन करता है।
मूलबन्ध : सिद्धासन या पद्मासन में बैठके बाह्य या आभ्यंतर कुम्भक करते हुए गुदाभाग एवं मूत्रेइद्रिय को ऊपर की और आकर्षित करे।
इस बंध में नाभि का निचे वाला हिस्सा खींच जायेगा। यह बंध ब्रम्हाकुम्भक के साथ लगाने में सुविधा रहती है। वैसे योगाभ्यासी साधक
इसे कई कई घंटो तक सहजावस्था में भी लगाए रहते है। दीर्घ अभ्यास किसी के सान्निध्य में करना उचित है।
लाभ: 1 इससे अपान का ऊध्र्गमन होकर प्राण के साथ एकता होती है इस प्रकार यह बंध मूलाधार चक्र को जाग्रत करता है और
कुंडलिनी-जागरण में अत्यंत सहायक है।
2 कोष्ठबध्ध्ता और बवासीर को दूर करने तथा जठराग्नि को तेज़ करने के लिए ये बंध अतिउत्तम है।
3 वीर्य को ऊधर्वगामी बनाता है,साधक को ऊध्र्वरेता बनाता है अतः ब्रह्मचर्य के लिए यह बंध महत्वपूर्ण है।

महाबंध : पद्मासन आदि किसी भी एक ध्यानोपयोगी आसान में बैठकर तीनो बँधो को एक साथ लगाना ‘महाबंध ‘कहलाता है इससे वह
सभी लाभ मिल जाते है।,जो पूर्वनिर्दिष्ट हैं। कुम्भक मई ये तीनो बंध लगते है।
लाभ:1 प्राण ऊर्ध्वगामी होता है।
2 वीर्य की शुद्धि और बल की वृद्धि होती है।
3 महाबंध से इड़ा,पिंगला और सुषुम्णा का संगम प्राप्त होता है।

प्राणायाम मानव शरीर को हमारे ऋषि मुनियो, साधको द्वारा दिया हुआ स्वर्ण रूपी ज्ञान है इससे हमारे आतंरिक एवं बाह्य शरीर की
शुद्धि होती है।

[vc_single_image image=”102″ img_size=”full”]
mindpower01

मनुष्य दिमाग में क्या शक्तियाँ होती है ?

By Spirituality, YogaNo Comments

मनुष्य के शरीर में मस्तिष्क एक ऐसा अंग है जो हमारे शरीर की क्रियाओ को निरंतर चलने के लिए शरीर के सभी अंगो को सिग्नल पहुँचाता है एवं नियत्रण करता है| हमारे द्वारा की गयी शारीरिक गतिविधियों को भी नियंत्रित हमारा मस्तिष्क ही करता है ,परन्तु हमारा दिमाग यही काम नहीं करता हमारे मस्तिष्क की शक्तियाँ अपार है ,दुनिया में सबसे ज्यादा शक्ति मनुष्य के मस्तिष्क में होती है ,मनुष्य चाहे तो कुछ भी कर सकता है तथा अपने जीवन को एक उचित दिशा प्रदान करता है |
धारणा एवं किसी चीज़ को दिल से पाने की इच्छा एवं हम जो भी सपने देखते है उन्हें पुरे करने अर्थात साकार करने के लिए हमे सिर्फ हमारे मस्तिष्क को जाग्रत करना होगा | हम हमारी दिनचर्या में अपने दिमाग का सिर्फ 12-13 प्रतिशत ही उपयोग करते है जिसे हम चेतन मन कहते है ,हमारे मस्तिष्क में दो प्रकार के मन उपस्थित होते है | 85 प्रतिशत हमारा दिमाग उपयोग नहीं हो पता है क्यूंकि सामान्य अवस्था में वो जाग्रत नहीं रहता है जिसे हम अवचेतन मन कहते है, अवचेतन मन को अगर हम जाग्रत करले तो हम संसार के किसी भी कार्य को कर सकते है | अवचेतन मन को जाग्रत करने से मनुष्य अद्वितीय शक्तियों से भर जाता है तथा ऐसे मनुष्यो के लिए संसार में कोई भी कार्य मुश्किल नहीं होता है |
हम जो बनना चाहते है, हमारे जो सपने है उनको पूरा करने के लिए हम अत्यधिक सोचते है परन्तु हम हमारे मस्तिष्क को अन्य दूसरे तनाव एम् विचारो को नियंत्रित न कर पाने के कारण हम निराश हो जाते है ,परन्तु हम जो साकार करना चाहते है उसे अगर हम अवचेतन मन से सोचे तो मुमकिन हो सकता है ,अवचेतन मन को जाग्रत करने के लिए हमारे पास उपाय है|

[vc_single_image image=”274″ img_size=”full”]

जब आप सोते है तथा सोने जा रहे होते है उसके पांच मिनट पहले अपनी आँखों को बंद करके हमारे भीतर के सभी विचारो को भूलकर मस्तिष्क को शांत करे तथा ऐसा करने के लिए साँस को एक लय में अंदर खींचे एवं बाहर छोड़े जिससे आप रिलैक्स महसूस करोगे ,पश्चात आप जो भी सिद्ध या साकार करना चाहते है अर्थात जो भी आपके सपने है जैसे महँगी लग्ज़री कार, ऐशोआराम वाली लाइफ जो भी चाहते है उसे शांत मन से अपने अवचेतन मन में विचार बनाये तथा मस्तिष्क के मध्य में अपने सपने को एक सत्य घटित तश्वीर में देखे | ऐसा करने से आपका अवचेतन मन धीरे धीरे जाग्रत होने लगता है
तथा आपको अपने सपनो की ओर ले जाता है | मन को शांत रखने तथा दिल को ख़ुशी मिलने वाले कार्य करना चाहिए
जिससे मस्तिष्क में पॉजिटिव वाइब्रेशन बढ़ते है जिससे अवचेतन मन जाग्रत होता है | हमे हमारी सोच को बदलना
आवश्यक है खुद का आत्मविश्वास बढ़ाना चाहिये , में कुछ भी कर सकता हु ,मुझमे अपार शक्ति है , में बहुत ऊर्जावान हु ,में बहुत सुलझा हुआ हु ,में आत्मविश्वास से भरा गया हु ; ऐसी धारणा होने से हमारे मस्तिष्क में अवचेतन मन जाग्रत होने लगता है | अवचेतन मन को जाग्रत करने के लिए साधना एवं ध्यान लगाना होता है जिससे मनुष्य अवचेतन मन जाग्रत कर सकता है वह मनुष्य आलोकिक तथा अद्वितीय शक्तियों का साक्षात्कार कर लेता है

time04

समय के बारे में आप क्या जानते हो

By SpiritualityNo Comments

समय एक भौतिक राशि है जब समय बीतता है घटनाएँ घटित होती है तथा चलबिंदु स्थानांतरित होते है | इसलिए दो घटनाओ के होने
अथवा किसी गतिशील बिंदु के एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक जाने के अंतराल को समय कहते है |आप सब ने यह तो सुना ही होगा समय किसी के लिए नही रूखता जो व्यक्ति समय की प्रबलता के साथ चलता है ,एवं समय का सद्पयोग करता है व्यक्ति के जीवनकाल कभी कोई परेशानी नहीं होती है समय उसकी कद्र करने वालो का हमेशा साथ देता है | समय के अनुकूल कार्य करने पर व्यक्ति को धन वैभव
की जीवन में कभी कोई आपत्ति होती है ,एवं ऐसे व्यक्ति का समाज में अलग पद प्रतिष्ठा होती है तथा सभी उसका सम्मान करते है समय ही इंसान के भाग्य का कारण बनता है |

[vc_single_image image=”265″ img_size=”full”]

समय का सदुपयोग

समय सब के लिए एक समान होता है ,विद्यार्थी हो या प्रोफेसर , मजदुर हो या नेता सभी के जीवन में समय का बड़ा महत्त्व होता है
अर्थात जीवन के हर पल का सदुपयोग करना सीखे | आप जो कुछ भी अर्जित करते है चाहे वह धन हो या प्रतिभा समय का सदुपयोग ही
आपके जीवन की नींव मजबूत करता है, बच्चे को अगर जन्म से ही समय का सदुपयोग करने की सिख दी जाए , तो वह अपने जीवन को
एक सही दिशा में ले जायेगा | जो व्यक्ति समय की उपयोगिता से परिचित नहीं होता है ,वह अपने स्वर्णरूपी समय को फ़िज़ूलख़र्ची की बातो में एवं व्यर्थ की गतिविधिओ में गवा देगा हमेशा सज़क रहना चाहिए की हमारा समय व्यर्थ न जा रहा हो ,कोशिश करे कभी निकम्मे न बैठे रहे हर एक पल का सदुपयोग करे यकीनन एक दिन सफलता आपके कदम जरूर चूमेगी |
मनुष्य के जीवन में सबसे मूलयवान समय ही होता है | बिगड़ा स्वास्थ , खर्च हुआ धन तथा रूठा हुआ मित्र वापस आ जाता है ,परन्तु जो समय निकल चूका है सदुपयोग नहीं किया वो कभी लौटकर वापस नहीं आता है | समय किसी के लिए रुखता नहीं समय की सुई किसी का इंतज़ार नहीं करती है वह निरंतर चलती रहती है तथा हमे भी उसके साथ निरंतर चलना होगा | हिंदी के कवी कबीरदास जी ने समय की महत्वता को बताते हुए लिखा है कल करे सो आज कर ,आज करे सो अब इससे समय की महत्वता को आसानी से समझा जा सकता है |

[vc_single_image image=”266″ img_size=”full”]

समय मापन

अतिप्राचीन काल में समय जानने तथा उसका मापन करने के लिए कोई उपकरण नहीं था ,सूर्य की विभिन्न अवस्थाओं के आधार पर प्रातः ,दोपहर,रात्रि की कल्पना की यह समय स्थूल रूप से प्रत्यक्ष है | इसी प्रकार सूर्य की कक्षा गितिविधियों से ही पक्षों ,महीनो, ऋतुओ
एवं वर्षो की कल्पना की होगी | रात के समय का ज्ञान नक्षत्रो के आहार पर किया जाता था उसके बाद पानी तथा बालू के घटीयंत्र बनाये
गए ,यह भारत में प्राचीन काल से प्रचलित है | वर्तमान में हम घड़ी का उपयोग करते है जो की सटीक समय दर्शाती है |

[vc_single_image image=”264″ img_size=”full”]

समय सीमा

संसार में हमे सभी वस्तु या व्यवस्था असीमित रूप में प्राप्त हो सकती है परन्तु समय हर किसी को सिमित ही मिलता है,जो इसकी कद्र कर लेता है वह परमात्मा के अनुकूल जीवन में मोक्ष प्राप्त कर लेता है समय को एक अच्छा चिकित्स्क भी कहा गया है यह बड़े से बड़े
घाव को भी भर देता है ,कहते है ! जीवन चार दिन का होता है दो दिन आपके हक़ में दो दिन आपके खिलाफ जब समय आपके हक़ में होतो गुरुर मत करना और आपके खिलाफ हो तो थोड़ा सबर जरूर करना

addiction03

लत क्यों लग जाती है क्या आप जानते हो ?

By DepressionNo Comments

पूरी दुनिया में कई गंभीर समस्याएँ है परन्तु एक आम व्यक्ति के जीवन में सबसे बड़ी समस्या किसी भी चीज़ की लत का लगना होती है | लत किसी भी प्रकार की हो सकती है ,जैसे किसीको अधिक मसालेदार खाना खाने की आदत होती है,किसीको अधिक मीठा खाने की लत होती है | पूरी दुनिया में हर व्यक्ति विशेष को किसी न किसी चीज़ की लत जरूर होती है जो की हमारे जीवन की सबसे दयनीय समस्या है जिससे हमारे करियर पर सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ता है ,और हम पूर्णरूप से हमारे कार्य पर ध्यान नहीं दे पाते है जो की किसी भी कार्य को करने के लिए बहुत आवश्यक होता है | ऐसी किसी भी प्रकार की लत लगने से हमने सतर्क होकर खुद का बचाव करना चाहिए |

लत के प्रकार(types of addiction)

लत किसी भी प्रकार की हो सकती है ,जैसे किसी से बात करने की लत ,मसालेदार खाना ,अत्यधिक मीठा खाना ,किसी एक व्यक्ति की ओर आकर्षित होकर उसको अपनी आदत बनाना ,दवाइयों की लत ,ड्रग्स लेना ,तम्बाकू का सेवन ,गांजा ,शराब का सेवन ,अधिक खर्च करना,जुआ खेलना आदि ऐसी कई लतो के लगने के कारण व्यक्ति को कई समस्याओ का सामना करना पड़ता है तथा इससे ह्रदय रोग एवं अन्य स्वास्थ सम्बन्धी कई बीमारिया उत्पन्न होती है | किसी भी लत का व्यक्ति के शरीर पर हावी होने से उसे कई घरलू मतभेद एवं रिस्तो के टूटने का डर बना रहता है एवं अध्ययन कार्य में भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है |
कते है एवं स्वस्थ एवं सुचारु रूप से जीवन यापन कर सकते है |

[vc_single_image image=”277″ img_size=”full”]

युवाओ पर बुरी लत का प्रभाव

युवाओ में किसी भी चीज़ की बहुत जल्दी लत लग जाती है ,गलत संगती होने के कारण बुरी लत आसानी से लग जाती है | तथा उसके विधार्थी जीवन एवं करियर पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है ,नशे की लत आजकल सबसे ज्यादा आपको युवाओ में देखने मिल ही जाती है | सिगरेट ,तम्बाकू,शराब , गांजा तथा अन्य नशीले पदार्थ जो की आसानी से उपलब्ध हो जाते है जिसमे पेट्रोल सूंघना ,विक्स खाना ,सर्दी-खासी की दवाइयों को नशे करने के लिए उपयोग करना ,थिनर सूंघना आदि|विधार्थी जीवन में ऐसी लातो का लगना कई गंभीर समस्याओ को न्योता देती है जिससे युवाओ के अध्ययन काल के साथ-साथ उनके भविष्य को भी ख़त्म कर देती है |

[vc_single_image image=”278″ img_size=”full”]

लत लगने के बाद क्या करे ?

अपने मन पर काबू रखना एवं गलत पदार्थो के सेवन करने से हमेशा इनकार करना चाहिए तथा हमेशा दिमाग को सतर्क रखना चाहिए किसी भी प्रकार के पदार्थ का सेवन करने से पहले उसे परख लेना चाहिए की उसमे कोई नशीले पदार्थ या हानिकारक अवयव तोह नहीं है ,जिससे हमारे स्वास्थ एवं दिमाग पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है | जब एक स्वस्थ आदमी किसी भी तनाव या परेशानी या दुःख-दर्द में होता है तो वह उससे छुटकारा पाने के लिए एवं मौज मस्ती व् आंनद के लिए नशीले पदार्थो का सेवन कर लेता है | एक दो बार सेवन करने के बाद जब वह फिर किसी तनाव या परेशानी में होता है तो फिर से नशीले पदार्थो का सेवन करने लगता है जिससे धीरे धीरे यह एक लत का रूप ले लेती है | किसी भी चीज़ की लत लगने के बाद हम उससे छुटकारा तभी प् सकते है जब हम हमारे मस्तिष्क में ठान ले की अब हमे किसी भी गलत पदार्थो का सेवन नहीं करना है तथा किसी भी कार्य में निरन्तर व्यस्त रहने से भी नशे की याद नहीं आती है | ध्यान (meditation) लगाने से किसी भी प्रकार की लत से निजात पायी जा सकती है | योग ,प्राणायाम करने से भी हम हमारे लत से ग्रसित शरीर को स्वस्थ बना सकते है एवं स्वस्थ एवं सुचारु रूप से जीवन यापन कर सकते है |

benefits_temple01

जाने मंदिर जाने से क्या फायदे होते है?

By Miracle MorningNo Comments

भारतीय प्राचीन संस्कृति तथा हमारी भारत भूमि ऐसी भूमि है जिसे आस्था का केंद्र माना जाता है इस भूमि पर कई ऋषि मुनियो एवं विद्वानों ने जन्म लिया है यह ईश्वर की भूमि है तथा यहां पर भगवानो की पूजा की जाती है एवं बहुत मंदिर है, तथा मंदिरो का वातावरण बहुत शुद्ध एवं शीतल होता है जिससे मंदिर के भीतर प्रवेश करने से मन को शीतल क्र देने वाली शांति प्राप्त होती है | मदिर जाकर मनुष्य सभी मुश्किलों एवं दुःख तक़लीफो को दूर करने के लिए ईश्वर से प्राथना करते है
मंदिर के अंदर तथा बहार का वातावरण बहुत शांति प्रदान करने वाला तथा साफ़ एवं स्वच्छ होता है तथा मंदिर जाने से कई फायदे होते है जिससे हमारे शारीरिक एवं मानसिक समस्याओ का निवारण हो जाता है | वैज्ञानिक आधार पर देखा जाए तो मंदिर जाने से मस्तिष्क में सकारात्मक ऊर्जा आती है जिससे हमारा मस्तिष्क एक नयी शुद्ध ऊर्जा से भर जाता है |

[vc_single_image image=”283″ img_size=”full”]

मंदिरो में सुबह शाम ईश्वर की आराधना की जाती है तथा संस्कृत के मंत्रो का उच्चारण किया जाता है जिसकी ध्वनि से वायुमंडल में समाहित नकारात्मक ऊर्जा का नाश हो जाता है एवं सकारात्मक ऊर्जा उसके स्थान पर आजाती है | मंदिर में शंख बजाया जाता है ,घण्टिया बजायी जाती है तथा डमरू बजाया जाता है एवं दीप जलाये जाते है जिससे मंदिर के वातावरण में शुद्धता रहती है तथा मंदिर जाने से हमारे शरीर में तथा मस्तिष्क में पॉजिटिव वाइब्रेशन बहुत तेज़ी से होते है
जिससे मंदिर के वातावरण में प्रवेश करने से ही हमारा मानसिक तनाव कम हो जाता है एवं मन शीतल एवं शांत हो जाता है ,हमारा शरीर प्रफुल्लित हो उठता है जिससे नयी ऊर्जा हमारे शरीर में प्रवेश करती है | ॐ का उच्चारण ,शंख ,घण्टा ,डमरू का जब स्वर सुनाई देता है तो हम आसानी से उस स्वर में ॐ शब्द का उच्चारण सुन पाते है तथा इसकी स्वर ध्वनि से वायु में मौजूद कीटाणुओं का नाश होता है , इसे भी वैज्ञानिकों द्वारा प्रमाणित किया गया है परन्तु यह सभी क्रियाए अति प्राचीन काल के समय से चली आ रही है अर्थात ऋषि मुनियो द्वारा इन क्रियाओ को किया जाता था तथा इसके बारे में उन्होंने पहले ही खोज कर ली थी | वैज्ञानिको द्वारा इस प्रक्रिया को अलग दृश्टिकोण से बताया जाता है परन्तु उसके भीतर का सार समान ही है |
मंदिरो मे अधिक सीढिया होना ,हाथ जोड़ना ,ताली बजाना ,शीश झुकाना और भूमि पर लेटकर ईश्वर को प्रणाम करने के पीछे भी हमारे शरीर में कई क्रियाऐं होती है जिससे हमारा मन मंदिर में जाने से शांत होता है एवं अच्छे विचारो का आगमन होता है | ताली बजाने से भी कई फायदे होते है जब हम हमारे दोनों हाथो को एक दूसरे के सामने रखकर निरंतर बजाते है
तो हमारे हाथ में पाए जाने वाले बिंदु आपस में दबते है तथा बार बार दबने से उनमे एक्यूप्रेसर की क्रिया होती है जिससे हमारे शरीर के कई अंगो पर अच्छा प्रभाव पड़ता है | वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो मंदिर जाने से बहुत लाभ होते है |
हमारे देश में हर स्थान पर मंदिर है तथा मंदिरो में ईश्वर की स्थापना अतिप्राचीन काल से चली आ रही है हमारे देश की शोभा और रमणीयता, सुंदरता भी मंदिरो से ही पहचानी जाती है |

thirdeye01

तीसरा नेत्र क्या है ?

By Yoga, Your BrainNo Comments

यहां हम आपको कुछ रोचक जानकारी प्रदान कर रहे है तीसरी आँख (the third eye) जिसका जाग्रत होना अतिआवशयक है संसार के सभी प्राणियों में सिर्फ मानव शरीर में यह क्रिया होती है | वर्तमान में आधुनिक चिकित्सा विज्ञान द्वारा पूर्व योगविज्ञान द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत नाड़ी द्वारा मस्तिष्क के दोनों भागो का प्रयोग को अत्यंत महत्त्व दिया जा रहा है |
योगविज्ञान में नाड़ी को मानवशरीर में प्रवाहित होने वाली भौतिक ,मानसिक व् आध्यात्मिक ऊर्जा का माध्यम बताया गया है| हमारे शरीर में 72 हजार से भी अधिक नाड़ियाँ स्थित है ,किन्तु इन सभी नाड़ियो में इडा ,पिंगला व सुषुम्णा नाड़ी सर्वाधिक महत्वपूर्ण है | सामान्य अवस्था में केवल इडा अथवा पिंगला नाडिया ही सक्रीय रहती है , सुषुम्णा नाड़ी सामान्यतया निष्क्रिय ही रहती है |

श्वसन क्रिया के दौरान शरीर में प्रविष्ट होने वाली प्राणवायु या तो इडा नाडी के मध्य से अथवा पिंगला नाडी के मध्य से यात्रा करती है| इडा(चन्द्रस्वर )नाडी का आरम्भ बांए नासाछिद्र से होता है ,जो दाँये नासाछिद्र से मिलता है |इस प्रकार प्रवाहित प्राणवायु लघुमस्तिष्क(cerebellum)व मेड्यूला ओब्लोंगेटा (medulla oblongata)में प्रविष्ट होती हुई ,सुषुम्णा काण्ड के बाँए तरफ यात्रा करते हुए सुषुम्णा काण्ड के अंत में यात्रा समाप्त करती है | इसी प्रकार दूसरी ओर पिंगला (सूर्यस्वर )नाडी द्वारा भी प्राणवायु के संचरण का कार्य सम्पादित होता है

[vc_single_image image=”287″ img_size=”full”]

नासिका के आतंरिक कोषो में स्थित प्रत्येक नासिका छिद्र में कार्टिलेज नामक ऊत्तक )tissue )से बने द्वार होते है ,जिनका पूर्ण नियंत्रण आज्ञाचक्र के द्वारा सम्पादित होता है | श्वसन की अवस्था में जब एक छिद्र खुलता है तो उसी समय दूसरे नासिका छिद्र से श्वास का प्रवेश पूर्णतया बंद हो जाता है | नासिका के ऊपरी भाग (छत )पर,जहा दोनों नासाछिद्र संयुक्त होते है एवं जहा इडा एवं पिंगला नाडी का उद्गम स्थान होता है ,वहा शरीर का प्रमुख जीवनीय बिंदु (vital spot )होता है | यही पर इडा (parasympathetic परानुकम्पी )एवं पिंगला (sympathetic अनुकम्पी) संयुक्त होकर एक प्लेक्सस (plexus )बनाती है ,जिसे आज्ञाचक्र कहते है |
हमारे जीवन साधना के शास्त्रों में इसे तीसरे नेत्र (the third eye )की संज्ञा दी गयी है जो साधक इस बिंदु को सक्रीय कर लेता है वह अद्वितीय शक्ति को धारण कर लेता है

generation-gap03

पीढ़ी अंतराल क्या है ?

By SpiritualityNo Comments

जैसा की हम जानते है ,बदलते समय के साथ -साथ संसार में कई परिवर्तन होते है ,तथा परिवर्तन ही संसार का नियम है| परिवर्तन के चलते जो -जो व्यक्ति ने जिस समय अंतराल में धरती पर जन्म लिया है तथा उनकी सोच विचार पूर्व में जन्मे लोगो से बहुत अलग है, हम अक्सर देखते है हमारे पूर्वज हुए लोग हमारे दादा दादी का समय ,हमारे माता पिता से तथा
हमारा समय हमारे माता पिता से बिलकुल अलग है | हमारे पूर्वजो केविचारो में और आज की वर्तमान पीढ़ी के विचारो मे अत्यंत फर्क देखने को मिलता है तथा विचारो की इस भिन्नता के कारण निरंतर होते हुए बदलाव को पीढ़ी अंतराल या जनरेशन गैप कहा जाता है |
जनरेशन गैप एक दिलचस्प अवधारणा पीढ़ी अंतराल आमतौर पर माता पिता एवं उनके बच्चो के बिच संघर्ष का कारण है | यह एक वास्तविक एवं दिलचस्प अवधारणा है ,संसार में अगर इस तरह का अंतर नहीं होता तो वास्तव में दुनिया काफी अलग होती ,फैशन के इस दौर में तथा वर्तमान के युवाओ की विचारधाराओ में बहुत बड़ा परिवर्तन देखने को मिला है | वर्तमान पीढ़ी के पास तकनिकी ज्ञान होने तथा मल्टीमीडिया अथवा मोबाइल फ़ोन से जुड़ने के बाद बहुत परिवर्तन आया है | राजनितिक ,सामाजिक, धार्मिक सभी विचारधारों में आज की पीढ़ी के विचार उनके पूर्वज व् माता पिता के विचारो से पूर्णतः भिन्न है तथा उनका नजरिया कुछ और ही है तथा हमारे भारत देश में बदलाव का मूल कारण भी विचारधाराओ की भिन्नत्ता ही है |

[vc_single_image image=”291″ img_size=”full”]

वर्त्तमान पीढ़ी का जीवन यापन का तरीका

पीढ़ी अंतराल के चलते समाज कई बदलाव हुए है | विशेषकर भारत जैसे देश में जहा संयुक्त परिवार की प्रथा पहले से ही प्रचलित थी ,तथा बाद में भारत में अलग परिवार बसाने की अवधारणा शुरू हो गयी और यह भी पीढ़ी के अंतराल का ही एक परिणाम है | लोग इन दिनों अपनी-अपनी गोपनीयता (privacy) की लालसा रहते है और अपने जीवन को अपने स्तर व अपने तरीके से जीना चाहते है ,परन्तु संयुक्त परिवार होना इसमें मुख्य बाधा है इस प्रकार पीढ़ियों के बदलाव के चलते लोग अपने अलग परिवार बसाते है एवं संयुक्त परिवार में रहना पसंद नहीं करते तथा यह भी पीढ़ी अंतराल का ही परिणाम है |
भविष्य में आने वाली पीढ़ी की विचारधाराओ में और भी अत्यधिक फर्क देखने को मिलेगा|

yoga001

योग को हमें कैसे जाने ?

By YogaNo Comments

यहाँ हम आपको भारत विश्व की सर्वोच्च संस्कृति ,आध्यात्मिक,आर्थिक एवं सामाजिक शक्ति का योग के आधार पर संछिप्त में वर्णन कर इसकी सत्यत्ता से रूबरू करने का प्रयास कर रहे है तथा ध्यान से पढ़े। यहाँ आज हमारा विषय योग के आधार पर जीवन दर्शन है।

योग एक जीवन दर्शन

योग एक जीवन दर्शन है ,योग आत्मानुशासन है ,योग एक जीवन पध्दति है ,योग व्याधिमुक्त व् समधिमुक्त जीवन की संकल्पना है। योग आत्मोपचार एवं आत्मदर्शन की श्रेष्ठ आध्यात्मिक विद्या है। योग व्यक्तित्व को वामन से विराट बनाने की या समग्र रूप से स्वयं को रूपांतरित व विकसित करने की आध्यात्मिक विद्या है। योग मात्र एक वैकल्पिक चिकित्सा पध्दति नहीं अपितु योग का प्रयोग परिणामो पर आधारित एक ऐसा प्रमाण है जो व्याधि को निर्मूल करता है। अतः यह एक सम्पूर्ण विद्या का,शरीर रोगों का ही नहीं बल्कि मानस रोगों का भी ,चिकित्सा शास्त्र है।
योग एलोपेथी की तरह कोई लाक्षणिक चिकित्सा नहीं अपितु रोगों के मूल कारण को निर्मूल कर हमे भीतर से स्वस्थता प्रदान करता है।

[vc_single_image image=”298″ img_size=”full”]

योग को मात्र एक व्यायाम की तरह देखनाया वर्ग विशेष की मात्र पूजापाठ की एक पध्दति की तरह देखना संकीर्णतावूर्ण ,अविवेकी द्रष्टिकोण है। स्वार्थ ,आग्रह,अज्ञान एवं अहंकार से ऊपर उठकर योग को हमे एक सम्पूर्ण विज्ञान की तरह देखना चाहिए।
अष्टचक्र परिभाषा
योग की पौराणिक मान्यता है कि इससे अष्टचक्र जाग्रत होते है एवं प्राणायाम के निरंतर अभ्यास से जन्म-जन्मांतर के संचित अशुभ संस्कार व पाप परिक्षीण होते है।
हमने अष्टचक्रो की वैज्ञानिक पृष्ठ्भूमि की जब अन्वेषणा की एवं प्राचीन सांस्कृतिक शब्दों का जब अर्वाचीन चिकित्सा विज्ञान के साथ तुलनात्मक अध्ययन किया तोह पाया कि मूलाधार,स्वाधिष्ठान ,मणिपुर ,हृदय, अनाहत ,आज्ञा एवं सहस्रार चक्र क्रमशः
reproductive,excretory,digestive,skeletal,circulatory,respiratory,nervousएवं endocrinal system से सम्बन्ध है।
मूलाधार से सहस्रार चक्र तक अष्टचक्रो का जो कार्य है वही कार्य reproductive system से लेकर endocrinal system का है।
क्रियात्मक योगाभ्यास के आठ प्राणायाम इन्ही अष्टचक्रो अथवा आठ सिस्टम को सक्रीय एवं संतुलित बनाते है। एक-एक सिस्टम के असंतुलन से अनेक प्रकार की व्याधियाँ या विकार उत्पन्न होते है। भाषा कुछ भी हो विज्ञानं और अध्यात्म का तात्पर्य एक ही होता है।

भाषा तोह मात्र भावो की अभिव्यक्ति का माध्यम है ,लेकिन चार सौ वर्षो की गुलामी की आत्मग्लानि के दौर से हम कुछ ऐसे गुज़रे की हमे वात ,पित्त व कफ की बजाय anabolism,catabolism,metabolism,ठीक से समझ आता है। अपनी परंपरा, संस्कृति व ज्ञान को हम अज्ञानवश आत्मगौरव के रूप में न देखकर आत्मग्लानि से भर गए। चक्र पढ़कर चक्र में पड़ गए
परन्तु शब्द को पढ़कर हम अपने आप को systematic कहने लग गए जबकि प्राचीन ज्ञान व अर्वाचीन ज्ञान का तात्पर्य एक ही था-सत्य का बोध। प्रज्ञापराधो हि सर्वरोगाणाम मूलकारणाम के आयुर्वेदोक्त सिद्धांत के बजाय stress is the main cause of all disesases- यह वचन हमे अधिक वैज्ञानिक लगने लगा। अब तोह अज्ञान एवं आग्रह छोड़ो एवं सत्य से जोड़ो। उदहारण के लिए endocrinal system के असंतुलन से तनाव व तनावजनित ह्रदय रोग, उच्च रक्तचाप ,अवसाद ,मोटापा ,व मधुमेह आदि अनेक जटिल रोग उतपन्न हो जाते है।

[vc_single_image image=”259″ img_size=”full”]

इसी तरह से स्केलीतल सिस्टम के असंतुलन से शताधिक प्रकार का (सौ से अधिक प्रकार का )तो ऑर्टराइटीस होता है एवं व्यक्ति मांशपेशियों की अनेक विकृतियों का शिकार हो जाता है। कहने का मतलब है की आंतरिक सिस्टम में आया किसी तरह का असंतुलन ही
रोग है जबकि भितर का संतुलन ही आरोग्यहै। लाखो करोड़ो लोगो पर योग के प्रत्यक्ष एवं परोक्ष प्रयोग से हमने यह पाया है की मुख्यतः आठ प्राणायामों के विधिपूर्वक एक सुनिश्चित
समय एवं संकल्पबद्ध अभ्यास से हमारे आठों चक्र या आंठो सिस्टम पूरी तरह से संतुलित हो जाते है। परिणामतः हम योग से एक निरामय जीवन पाते है। साथ ही हम दवा के रूप में जो केमिकल साल्ट या हार्मोन बहार से ले रहे थे ,धीरे-धीरे उसकी आवश्यकता नहीं रह जाती क्योंकि जो हम बहार से ले रहे थे वे सारे साल्ट या हार्मोन्स हमे भीतर से ही संतुलित मात्रा में प्राप्त हो जाते है।
योग एलोपैथी की तरह एक पिजन होल ट्रीटमेंट ' न होकर आरोग्य की एक सम्पूर्ण संकल्पना है , आपातकालीन चिकित्सा व शल्य चिकित्सा को छोड़कर शेष चिकित्सा के सभी क्षेत्रो में योग एक श्रेश्ठतम चिकित्सा विधा है।

akhand-bharat03

गृह युद्ध (अखंडभारत का युद्ध)उपरांत

By SpiritualityNo Comments

महाभारत काल के महायुद्ध के उपरांत जब अखंड भारत का विनाश हुआ था ,जब भारत बहुत विशाल था जम्बुमहाद्वीप (एशिया महाद्वीप) का सबसे बड़ा देश था। तथा महाभारत के युद्ध में अखडं भारत के सभी राजाओ ने भाग लिया था तथा उनकी सेनाओं के साथ पांडवो और कौंरवों के युद्ध में धर्म केलिए लडे थे। परन्तु ,युद्ध समाप्त होने के पश्चात सिर्फ पांडव बचे थे , विनाशकाय युद्ध के पश्चात् कोई जीवित नहीं बचा सिर्फ उनकी पत्निया एवं लाचार बच्चे बहु बेटियाँ बची थी तथा उनका क्या हुआ होगा जब न खाने के लिए अन्न था ना कुछ व्यवस्था ,इस युद्ध में लगभग तीन अरब सैनिक एवं राजा तथा प्रजा समाप्त हो गयी थी।
ए अपने विराट स्वरुप का दर्शन कराया था।

[vc_single_image image=”305″ img_size=”full”]

महाभारत विनाश स्थिति

युद्ध के बाद मारे गए सेनिको एवं राजाओ की बेवाओँ ,बहु-बेटियों,के साथ क्या हुआ उसकी कल्पना करना भी बहुत महावहि है ,विनाश के बाद उनकी स्थिति भुखमरी से लाचार पीड़ित लोग ,भूख -प्यास से मरते एवं रोग से ग्रसित एवं पीड़ित परिवारों का क्या हुआ होगा कोई नहीं जानता परन्तु इस गंभीर स्थिति से बाहर कैसे आये उन्होंने सब कैसे स्थिति को संभाला उनकी स्थिति को उन्नत होने में करीब
४०० साल का समय लगा। जब तक अखंडभारत के टुकड़े होचुके थे। म्यांमार , श्रीलंका ,अफगानिस्तान आदि ऐसे १४ हिस्सों में बटा भारत अब अखंड भारत नहीं रहा था ,ततपश्चात हिस्सों में बँटने के साथ ही साथ धर्म भी अलग अलग हो गए।

[vc_single_image image=”306″ img_size=”full”]

महाभारत युद्ध क्यों आवश्यक था

महाभारत काल का युद्ध वैसे तोह पांडवो एवं कौरवो के पारिवारिक मतभेद हेतु हुआ था। परन्तु अखण्डभारत काल में धर्म को सबसे ऊँचा मानते थे तथा धर्म का उलंघन असहनीय माना जाता था ,धर्म के सबसे बड़े विद्वान धर्मराज युधिष्ठिर हमेशा धर्म के अनुसार चलते थे। जब पांडव और कौरव युद्ध भूमि पर एकत्रित हुए थे ,तब युधिष्ठिर जी ने अपने भाइयों(कौरवो) के साथ युद्ध करना उचित नहीं समझा तथा धर्म की बात थी तोह इस महायुद्ध में धर्म-अधर्म के इस युद्ध में अखंड भारत के समस्त राजाओ ने अपनी अपनी सेना के साथ इस युद्ध में पांडवो और कौरवो का साथ दिया था। अर्जुन भी इस युद्ध से सहमत नहीं थे क्यूंकि अपने ही भाइयों के विरुद्ध सश्त्र उठाना उन्हें ठीक आभास नहीं हुआ ,तब श्री कृष्ण जी ने अर्जुन को समझाते हुए वास्तविक धर्म का ज्ञान कराया कि ,यह जो तुम्हारे विरुद्ध खड़े तुम्हारे भाई
जरूर है परन्तु ये धर्म से विचलित हो रहे है तथा धर्म हेतु इनसे युद्ध करना अधर्म नहीं है यह तुम्हारा क्षत्रिय धर्म है। धर्म ही श्रेष्ठ है ,अर्जुन को धर्म एवं ब्रह्मज्ञान का मार्गदर्शन कराते हु

lacksleep01

नींद पूरी न होने से क्या होता है ?

By DepressionNo Comments

एक व्यक्ति को जीवन का सुचारु रूप से चलाने के लिए नींद का पूरा होना बहुत आवश्यक है हमे उठने के लिए अगर अलार्म लगाने की जरुरत पड़ती है ,या उठते समय किसी लती पेय पदार्थ को पिने की इच्छा होती है ,जिससे आप नींद पूरी हुए बिना चेतन हो जाते हो तो आपको और नींद की आवश्यकता है | जिससे आपका शरीर पूर्ण रूप से ऊर्जावान एवं मजबूत रहेगा |
नींद की कमी के कारण कई प्रकार की समस्याए शरीर में उजागर हो सकती है जिससे हमारा जीवन तनाव या अन्य परेशानियों से गुजरता है | मस्तिष्क को सुबह उठने पर पूरा फ्रेश एवं हल्का हो जाना चाहिए |,जिससे हमारे विचार एवं पॉजिटिव वाइब्रेशन बनते रहते है |

[vc_single_image image=”302″ img_size=”full”]

१. नींद का ठीक तरह से पूरा न होने पर हमारा शरीर पूरी तरह जाग्रत नहीं हो सकता है जिससे बैचेनी महसूस होती है एवं
कम नींद और अधिक आत्म्विश्वास होने पर शरीर में तनाव उत्पन्न होते है तथा मन में शांति नहीं रहती है |
२.वाहन चलाते समय आँखों में चुभन एवं आँखों का जलन करना भी नींद पूरी न होने के कारण होता है ,जिससे वाहन
चलाते समय पूरी तरह चलाने पर ध्यान नहीं रहता है ,एवं दिमाग में अन्य कई व्यर्थ के ख्याल उतपन्न होने पर हमारा
आत्मविश्वास कम होने लगता है तथा अधिक काम की वजह से न सो पाने एवं लम्बी दुरी तक वाहन चलाने पर अक्सर नींद
आने का खतरा बढ़ जाता है जिससे चालक वाहन चलाते चलाते ही झपकियाँ लेने लगता है जिससे कई बड़ी दुर्घटनाये होती
है ,इसलिए सावधानी रखना आवश्यक है |
३. अधिक कार्य करने के बाद तथा नींद पूरी न होने एवं भोजन ठीक से नहीं करने पर शरीर में गर्मी बढ़ जाती है तथा अन्य
कई समस्याए शुरू हो जाती है जैसे पेट में जलन ,अपचन , शरीर का तापमान बढ़ना ,नींद पूरी न होने की वजह से शरीर में
पाचन तंत्र की क्षमता कम हो जाती है, जिससे आपका पेट ठीक से साफ़ नही हो पता एवं कब्ज जैसी बीमारी होने का खतरा
बढ़ जाता है |
४. मस्तिष्क को पूरा आराम मिलना बहुत आवश्यक होता है, जो व्यक्ति पर्याप्त रूप से नींद नहीं ले पाता है तथा मस्तिष्क को
पूरा आराम नहीं दे पाने से उसे मानसिक तनाव, शरीर में अकड़न, सिर भारी होना, चिड़चिड़ा व्यवहार हो जाना आदि |
५.दिन भर कार्य करने के पश्चात जब रात में हम सो रहे होते है तब हमारे शरीर में सोते समय कुछ क्रियांए होती रहती है
,शरीर में सुधार होता है तथा कोशिकाये रिलैक्स होती है एवं नयी कोशिकाओं का जन्म होता है जब हम सो रहे होते है तब
हमारे शरीर की लम्बाई सामान्य से ज्यादा हो जाती है | नींद पूरी न होने से मानसिक क्षमता एवं स्मरण सकती काम हो
जाती है जो की हमारे लिए बहुत ही खतरनाक होती है जिससे हमारी याददास्त कमजोर होने लगती है यहाँ तक की हमे
भूलने की बीमारी हो सकती है ,इसलिए नींद का पर्याप्त होना बाहत आवश्यक है