स्त्री-शरीर की सोभा(रमणीयता )

स्त्री शरीर में इधर केश है , इधर रक्त और मांश है ,यही तोह युवती स्त्री का शरीर है। यहाँ पर हम आपको यह बतलाना चाह रहे है कि , स्त्री मात्र एक ईश्वर के द्वारा रची हुई एक खूबसूरत संरचना है ,तथा हमारा उद्देश्य स्त्री का मान एवं उसकी सुंदरता उदारता को बनाये रखना है। आज के युग में जो स्त्री को मान सम्मान नहीं देता है तथा उसके शरीर पर तुच्छ रूप से बातें कही जाती है। स्त्री शरीर की रमणीयता एवं उसका निराकरण बहुत आवश्यक है।
स्त्री शरीरकी रमणीयताका निराकरण
जिसका ह्रदय विवेक से विशाल हो गया है ,उस ज्ञानी पुरुषको इस निन्दित नारी शरीर से क्या काम? बहुमूल्य वस्त्र और केसर-कस्तूरी आदि के लेपसे जिन्हे बारम्बार सजाकर दुलराया गया था ,समस्त देहधारियों के उन्ही अंगो को किसी समय सियार आदि मांसाहारी जिव नोचते और घसीटते है। जिस स्तन मंडल पर मेरु पर्वत के शिखरप्रान्त से सोल्लाष प्रवाहित होने वाली गंगाजी के जल की धारा के समान मोतियों के हार की शोभा देखि गयी थी, मृत्यु के पश्चात सम्प्पूर्ण दिशाओ की श्मशान-भूमियो में नारी के उसी स्तन का कुत्ते अन्न के छोटे टुकड़े की भाँति आस्वादन करते है। जैसे वन में चरने वाले गधे या ऊँट के रक्त,मांस ,और हड्डियों से सम्पन्न है उसी प्रकार स्त्रियों के अंग भी उन्ही उपकरणों से युक्त है। फिर नारी के प्रति ही लोगो का इतना आग्रह या आकर्षण क्यों है। केवल स्त्री के शरीर में जिस आपात-रमणीयता की कल्पना करते है , मेरी मान्यता के अनुसार वह भी उसमे है नहीं। रमणीयता की प्रतीति होती है,उसका एक कारण मोह ही है।

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मन में विकार उतपन्न करने वाली मदिरा में और युवती स्त्री में क्या अंतर है?एक जहाँ मद(नशे)-के द्वारा मनष्य को आनंद उल्लास प्रदान करती है ,वहाँ दूसरी काम का भाव जगाकर पुरुष के लिए आनंनदायिनी बनती है (अतः अपना कल्याण चाहने वाले पुरुष के लिए दोनों ही सामान्य रूप से त्याज्य है ) |जैसे धूमको ही केशके रूप में धारण करने वाली प्रज्वलित अग्निशिखा ,जो देझने में सुन्दर किन्तु छूने में दुस्सह है, तिनको को जला डालती है ,उसी प्रकार केश और काजल धारण करने वाली तथा आँखों को प्रिय लगने वाली नारियाँ , जिनका स्पर्श परिणाम में दुःख देने वाला है,पुरुष को वासना की आग से जलाती रहती है। स्त्री की रमणीयता विष समान  जैसे विष की लता सुन्दर फूलों से मनोहर लगती, नए-नए पल्ल्वोसे सुभोषित होती ,भ्र्मरो की क्रीड़ास्थली बनती,पुष्पगुच्छ धारण करती ,फूलों के केसर से पिले रंग की प्रतीत होती,अपना सेवन करने वाले मनुष्य को मार डालती है या पागल कर देती है ;उसी प्रकार स्त्रिया कामिनी फूलो का शृंगार धारण करने के कारण मनोहारिणी लगती है सुषोभित होती ,भ्र्मरो के समान चंचल नेत्रों के कटाक्ष-विलास का प्रदर्शन करती,पुष्प गुच्छो के समान स्तनों को वक्ष पर धारण करती ,फूलो के केसर की भांति सुनहरी गौर कांती से प्रकाशित होती ,मनुष्यो के विनाश लिए तत्पर रहती और काम-भावसे अपना सेवन करने वालो को उन्माद एवं मृत्यु आदिके अधीन कर देती है।कामवासना में मानव अपने मूढ़ एवं चित्त रूपी पक्षी को फ़साने के लिए स्त्री रूपी जाल को फैला रखा है।
नारी के स्तन से,नेत्र से ,नितम्ब से अथवा भौंह से जिसमे सार वस्तु के नाम पर सिर्फ मांस है ,अतएव जो किसी काम की वस्तु नहीं है ,मेरा क्या प्रयोजन है ?मई वह सब लेकर क्या करूँगा ? इधर मांस ,इधर हड्डिया ,इधर रक्त है ;यही नारी का शरीर है ,जो कुछ ही दिनों में जीर्ण-शीर्ण हो जाता है। संसार के मनुष्यो ! नारीके अंगोको थोड़े ही समय में होनेवाला यह परिणाम मेने तुम्हे बताया है ,फिर तुम क्यों भ्रम के पीछे दौड़ रहे हो?

पांच भूतों के सम्मिश्रण से बना हुआ अंगो का संगठन ही नारी नाम से प्रसिद्द हो रहा है ;अतः विवेक-बुद्धि से संपन्न कोई भी पुरुष आसक्ति से प्रेरित होकर क्यों उसकी ओर टूट पड़ेगा?जैसे हथिनी के लिए चंचल हुआ हाथी विंध्याचल पर्वत पर उसे फ़साने के लिए बनाये हुए गड्ढे में गिरकर बंध जाता और परम शोचनीय अवस्थाको पहुँच जाता है ;यही दशा तरुणी स्त्री के मोह में फँसे हुए तरुण पुरुष की होती है।